तुम किसी के जरखरीद गुलाम नहीं हो, ए.आई.बी के भी नहीं

शार्ली एब्दो के एक कार्टून में एक अजीब, असंतुलित सी दिखने वाली, भागती हुई नग्न मुस्लिम महिला की ass में बुर्क़े का एक छोर धँसा हुआ था और दूसरा हवा में लहरा रहा था। उस चित्र पर मुझे बिलकुल हँसी नहीं आई। पूरी कोशिश की कि हँसी आ जाए पर नहीं आई (पर्दे से इतनी सख़्त नफ़रत है कि अपने विवाह में भी सर ढाँपने का इरादा नहीं है, लेकिन उस दिन न उस कार्टून को समझ सकी न ही उसे बनाने वाले की इज़्ज़त कर सकी)।

ठीक उसी तरह ऑल इंडिया बकचोद (ए.आई.बी) का “रोस्ट”कार्यक्रम भी मुझे कुछ खास मज़ेदार नहीं लगा। एकाध चुटकुले अच्छे थे। तन्मय भट्ट की भाई-भतीजावाद पर चुटकी से कुछ तसल्ली मिली (हमारा एक तरफ़ डेमोक्रेसी की बीन बजाते-बजाते दूसरी तरफ़ अर्जुन कपूर और आलिया भट्ट जैसे बुरे कलाकारों को तबतक मुँह बंद कर झेलना जबतक वो रो-धोकर थोड़ा-बहुत अभिनय नहीं सीख लेते, दुर्भाग्यपूर्ण है)।

लेकिन अगर आपको ये लगता है कि ए.आई.बी की आलोचना का सवाल ही नहीं उठता तो मैं आपसे सहमत नहीं हो सकती। सबसे पहली बात तो यह कि “आप इतने काले/मोटे/भद्दे हैं” वाले जोक इंटरनेट पर सैकड़ों-हज़ारों की तादाद में फ्लोट करते रहते हैं। इस तरह के घिसे-पिटे व्यंग को नई शैली का ह्यूमर मानकर ए.आई.बी की ओर हमेशा-हमेशा के लिए कृतज्ञ या नतमस्तक हो जाने की ज़रुरत नहीं है।

दूसरी बात ये कि शो में गे जोक्स और माँ और बहन की गालियो की भरमार थी। लेकिन अगर गे जोक्स, माँ और बहन की गालियां (और शार्ली एब्दो के कार्टूनों में मुस्लिम औरतों की ass में बुर्का) मेरे तथाकथित प्रगतिशील मित्रों को अच्छी या क्षम्य लगती हैं तो इसके दो ही मतलब हो सकते हैं|

एक यह कि वो बोलने की आज़ादी छिन जाने की सम्भावना से बुरी तरह चिंतित हो गए हैं| बोलने की आज़ादी छिन जाने की घबराहट वाजिब है लेकिन उस घबराहट में सोचना बंद कर देने का क्या तुक है? चाहे सेंसर बोर्ड की मनमानी कैंची हो, चाहे किसी मुस्लिम धर्म गुरु द्वारा जारी किया गया फतवा या फिर किसी हिन्दू साधू की बेकार धमकियाँ, कोई आपकी वैचारिक स्वाधीनता पर विराम नहीं लगा सकता। डरिये मत; बन्दूक की गोलियों से शरीर छलनी हो सकता है, जज़्बा नहीं|

दूसरा मतलब ये हो सकता है कि शायद आज़ादी छिनने से ज़्यादा डर इस बात का है कि कहीं कोई आपको उन फतवा-प्रेमी या चड्डीवालों की तरह दकियानूसी न समझ बैठें या आपकी प्रोग्रेसिव छवि न खराब हो जाए या कोई आपके “सेंस ऑफ़ ह्यूमर” पर सवाल न कर दे| इसलिए आप अपने उन्हीं उसूलों को अनदेखा करने के लिए फटाफट तैयार हो जाते हैं जो आपको एक दो-पोस्ट पहले तक इतने प्रिय थे। अगर आप इतनी जल्दी डरकर अपने उसूलों पर यू-टर्न मारते हैं तो वो उसूल कभी आपके थे ही नही। आपकी तो बस एक इमेज थी जिसे आप किसी भी कीमत पर बचाना चाहते थे, चाहे वो कीमत आपकी अपनी विचारधारा ही क्यों न हो।

अगर माँ और बहन की गाली जायज़ है, तो कल लोग रेप जोक्स को भी जायज़ ठहरा सकते हैं। अगर एक बड़े गे निर्देशक की फिल्मों में काम करने के लिए मर्दों को अपनी पैंट उतारते देख आपको हँसी आ सकती है, तो आप तथाकथित “लूज़”, “चालाक” और “अपनी शकल और देह के सहारे आगे बढ़ने” वाली औरतों पर कटाक्ष करते लोगों को आड़े हाथ लेने का अधिकार भी खो देते हैं। अगर आप मुस्लिम औरतों का अभद्र प्रदर्शन देख कुछ ख़ास परेशान नहीं होते तो आपका नारीवाद बेहद खतरनाक रूप से खोखला है।

शार्ली एब्दो के हत्यारों से मुझे घिन थी और उनसे भी जो उन हत्याओं को न्यायसंगत सिद्ध करने में लगे हुए थे। धर्म, धार्मिक कर्म-काण्ड या फिर धार्मिक पुस्तकों के प्रति गंभीरता मेरी समझ से परे हैं। लेकिन मेरा मन दुखी भी हो रहा था क्योंकि उसे पता था कि इस बर्बरता के बाद “शार्ली एब्दो” की निंदा नामुमकिन हो गयी थी| चलो धर्म भूल जाओ पर उस पत्रिका के पन्नों पर हो रहे नारी के अपमान की, रंगभेद की और होमोफोबिया की चर्चा तक की सम्भावना ख़त्म हो चुकी थी|

शार्ली एब्दो की आलोचना करना भारतीय बुद्धिजीवियों के लिए कितना इनकनवीनिएंट है, ये मैं समझ सकती हूँ। पर ए.आई.बी से डरना तो हद ही हो गयी। मैं मानती हूँ कि तन्मय भट्ट ने आपको हँसाया होगा। मैंने भी उसके शो देखे हैं। मैं दिल से आज भी ये दुआ करती हूँ कि तन्मय और गैंग फले-फूले और ऐसे लोगों को मनोरंजन के विकल्प दे जिन्हें न सिमर की ससुराल से सरोकार है और न डॉली की डोली से। लेकिन तन्मय की हिम्मत से इतना अभिभूत न हों कि तन्मय के औसत दर्जे के ह्यूमर की आलोचना के हक़ के नाम तक पर आप बौखला जाएँ और खुद गाली-गलौज, पैसिव-एग्रेसिव अपडेट और “आमिर ने खुद क्या किया” जैसी whataboutery पर उतर आयें।

याद रखिये राह चलते हर लफंगे के मुँह से निकलने वाली गन्दी बात भी कई लोगों को हिम्मत वाली और मज़ेदार लगती हैं। बुरा मत मानियेगा (और कुछ लोग तो वैसे भी फ्री स्पीच की इतनी कदर करते हैं कि मोटी-मोटी गालियों कहे या सुने बिना उन्हें नींद ही नहीं आती होगी) लेकिन आपका ह्यूमर “ह्यूमर” और राह चलतों का ह्यूमर “ट्यूमर” समझना अव्वल दर्जे की मूर्खता और दोहरे मापदंड का उदाहरण है।

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