नक्सलवाद: एक गंभीर समस्या

प्रधान मंत्री द्वारा आंतरिक सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर समस्या कहलाये जाने वाले नक्सलवाद के मुद्दे ने देश का ध्यान अपनी ओर बड़ी मजबूती से खींच लिया है. नक्सली हिंसा की खबरें और तसवीरें अख़बार के पन्नों व टी वी चैनलों पर अब लगभग हर दूसरे दिन हमें ये याद दिलाती हैं कि इस समस्या की ओर और लापरवाही बरतना भयानक तबाही का कारण बन सकती है. आंकडें बताते हैं कि पिछले पाँच वर्षों में दस हज़ार से अधिक असैनिक नागरिक नक्सली हिंसा की बली चढ़ गए हैं. पिछले तीन महीनों में ही केंद्रीय रिज़र्व पोलिस बल के सौ से अधिक जवान भी नक्सलियों के विरुद्ध भिडंत में शहीद हो चुके हैं. ज़ाहिर है, ये गंभीर समस्या एक ऐसे समाधान की प्रतीक्षा में है जो न केवल वर्तमान में जारी खून खराबे पर अंकुश लगा सके बल्की भविष्य में भी इस तरह की बर्बादी की सम्भावना को जड़ से उखाड़ दे.

लेकिन किसी भी मुश्किल का हल निकलने के लिए उसकी तह तक पहुंचना आवश्यक होता है. हिंसा अचानक ही बिना किसी वजह नहीं भड़कती. इतिहास साक्षी है कि घोर सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक असंतोष ही लोगों को हथियार उठाने पर मजबूर करती है. आज भारत का एक विशाल जनसमूह खुद को दुःख और निराशा के ऐसे जाल में फँसा पाता है जिससे देश की मुख्यधारा से जुड़े अपेक्षाकृत धनी लोगों का कोई सरोकार नहीं है. उदारीकरण के पिछले दो दशकों में पढ़े लिखे, शहरी युवक-युवतियों के लिए सैकड़ों नए आयाम खुलते नजार आये. लेकिन मानव संसाधन विकास के लिए ज़रूरी मूलभूत सुख साधन जैसे पेयजल, खाद्यान्न उपलब्धी, टीकाकरण, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा एवं व्यवसायिक प्रशिक्षण की अनुपस्थिति में देश के करोड़ों लोग भूख, गरीबी और निःशब्दता के शिकार होकर १९९१ से प्रारंभ हुई आर्थिक तेज़ी में भागीदारी से वंचित रह गए. यही नहीं, देश के अपेक्षाकृत मुट्ठी भर संपन्न लोगों की भौतिक सुख सुविधाओं की माँग की आपूर्ति के लिए नए नए उद्योग स्थापित किये जाने लगे. इस तरह के विकास को अंजाम देने के लिए ज़मीन, बिजली, पानी आदि की निरंकुश खपत की जाने लगी. कारखाने खड़े करने के लिए कई एकड़ जंगल व उपजाऊ ज़मीन साफ़ कर दिए गए, खनन कार्य वैध तथा उससे भी कई गुना अधिक अवैध रूप से किया जाने लगा, तथा ऊर्जा परियोजनाओं को रूप देने के लिए कई नदियों को बिना सोचे समझे खतरनाक रूप से बाँध दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम में पर्यावरण के विनाश के साथ साथ विस्थापना की जटिल समस्या उत्पन्न हो गयी. किसान तथा जंगलों पर निर्भर लोगों को बिना उचित मुआवज़े, और कई बार पोलिस व किराये के गुंडों की मदद से, अपनी पुश्तैनी ज़मीन व आजीविका से हाथ धोने पर मजबूर कर दिया गया. सरकारी उदासीनता का शिकार होकर लाखों की तादाद में लाचारी महसूस करने वाले ये लोग तब पूरी तरह बेआवाज़ हो गए जब मीडिया फिल्म जगत, क्रिकेट तथा शहरी चकाचौंध को ‘कवर’ करने में एकनिष्टता से जुट गयी. ऐसे में इनमें से कुछ का प्रकट या अप्रकट रूप में हिंसा की ओर बढ़ना न्यायसंगत नहीं तो कम से कम स्वाभाविक ज़रूर प्रतीत होता है.

कोई भी जटिल समस्या विचारपूर्ण व बहुआयामी समाधान की माँग करती है. नक्सलवाद को ख़त्म करने के लिए प्रभावित लोगों के दिलों से निराशा के साए को प्रेम, सौहार्दता व ठोस तथा शर्तहीन मदद के प्रकाश से मिटाना होगा. सरकार की नक्सल प्रभावित जिलों की ओर ज़िम्मेदारी आर्थिक पुनर्निर्माण की योजनाओं की उद्घोषणा मात्र से पूरी नहीं हो सकती. इन योजनाओं को बिना किसी लापरवाही के तथा जवाबदेही व पारदर्शिता के साथ आकार और अंजाम देना अत्यावश्यक है. ये तभी संभव है जब नेताओं, दफ्तारशाहों और स्थानीय प्रशासन के बीच पनप रहे अनैतिक व नुक्सानदेह संसर्ग पर विराम लगा दिया जाता है. कई गैर सरकारी कंपनियों की बिना यथोचित क्षतिपूर्ति के तथा अवैध तरीके से खनिज, इमारती लकड़ी व उद्योग इकाई स्थापित करने की प्रवृति पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए केंद्रीय कानूनों को सुधारने व दृढ़ता से लागू करने की आवश्यकता है.

जहाँ तक सी आर पी एफ के जवानों का सवाल है, हमें ये याद रखना होगा कि ये सचेतन, हाड़ मांस के बने इंसान हैं, न कि बटन दबाते ही चालू हो जाने वाले रोबोट जो अत्यल्प वेतन, हर तीसरे महीने तबादले तथा बदहाल चिकित्सीय सेवाओं की मार झेलते हुए भी अमानवीय परिस्थियों में बिना मानसिक या शारीरिक थकावट के निरंतर देश के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी का निर्वाह कर सकते हैं. सरकार को इनकी ज़रूरतों की आपूर्ति बेहतर व नियमित तनख्वाह, पुख्ता स्वास्थ्य सेवाओं, जीवन बीमा, बच्चों की शिक्षा तथा तैनाती में स्थिरता के माध्यम से करने की ज़िम्मेदारी उठानी होगी. मूलतः एक ‘कानून व प्रणाली’ लागू करने वाली एजेंसी होने की वजह से इन लाठीधारी सिपाहियों को बीहड़ जंगलों में नक्सलियों द्वारा जारी गोरिल्ला युद्ध को समझने व जीतने के लायक प्रशिक्षण अधिकतर मिली ही नहीं. अतः वर्तमान में इनकी पीड़ाजनक व एकतरफा हार पर विराम लगाने के लिए इनके युद्ध कौशल को तत्काल ही सुधारने की, या एक ऐसे नए संयुक्त बल को स्थापित करने की ज़रुरत है जो नक्सली तत्वों में सैनिक भिडंत में जीत के प्रति संदेह उत्पन्न कर दे तथा उन्हें बातचीत व अन्य प्रजातान्त्रिक रास्तों से मतभेद का हल निकालने के लिए विवश कर दे.

विद्वान कहते हैं कि युद्ध में कोई विजयी नहीं होता. ये कहावत नक्सलवाद के साथ जारी संघर्ष के मामले में भी सटीक बैठती है. इस महाभारत में दोनों ओर एक ही मिट्टी से जन्मे लोग शामिल है. सच्ची भारतीय वह है जो हर देशवासी के सौभाग्य को अपना सौभाग्य माने और हर भारतीय आंसू को शोक का कारण समझे. अपने चारों ओर खड़ी स्वार्थ की दीवारों को तोड़कर समाज के हर व्यक्तिकी आवश्यकताओं व आकांक्षाओं को साथ लेकर चलने में ही चिरस्थायी एकता, प्रसन्नता और शांति संभव है.

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